मंगलवार, 21 सितम्बर 2010

तिरसठ साल से

अब क्यूँ नहीं आता
कोई भगत सिंह,
सरफरोशी की अलख जगाता हुआ!!

जब कि
आज भी
रोज़ घाट रहे हैं हज़ारों
जालियावाला काण्ड!

लाखों
सानडर्श देश की साँसे छीन रहे
आज भी!

आज
क्यूँ नहीं आता कोई
खुदीराम,
हमारी कायरता को
दिक्कारता..

क्यूँ नहीं आता
चरखा कातता वो अलखी बूढ़ा

क्यूँ नहीं
जगाती कोई अतीत की आवाज हमें?

हम शायद
अपनी अपनी
लालचों की रुई कान मे
डाल -
सो चुके हैं!

और नुच रही है
"हमारी माँ"

तिरसठ साल से
साल दर साल
बढ़ती ही जा रही हमारी निरीहता
को
कोसने वाला कोई तो आये!!
लेखन :- अमित आनंद पाण्डेय

अधूरे

मैं उसे देखकर व्यथित था 
उसकी उम्र और देह गोलाइयों से 
उसमे क्या कोई भी कमी थी 
बस वह चल ही तो नहीं सकती थी 
हाँ वह विकलांग थी पैरों से 
मुस्कुराती थी बहुत बातें बनाती थी 
रोज़ मिलती थी मुझे बस स्टैंड पर 
वह वैसाखियों से चलती थी 
हाँ वह वैसाखियों से सिर्फ चलती थी 
लेकिन उसकी तमन्ना थी उड़ने की 
उसके विचार थे प्रेम से सने 
वह दयामूर्ति थी दया की पात्र नहीं 
हाँ, वह दया की पात्र नहीं थी 
वह अन्दर से मजबूत और उत्साही थी 
वह जीवन सिखाने आई थी 
अपनी मौजूद सभी कमियों के साथ 
हाँ अपनी सभी कमियों के साथ जीना 
जान लेने के बाद बड़ा मुश्किल होता है 
लड़ना खुद से आसन कहाँ होता है 
वह लडती थी दौड़ती दुनियां से
हाँ वह लडती थी दौड़ती दुनियां से
उसमे जज्बा था कन्धा मिलाके चलने का 
उसे कमी का एहसास ही नहीं था 
उसकी शादी होने वाली थी 
हाँ उसकी शादी होने वाली थी 
जाने वाली थी एक नई दुनिया में 
मगर आधे अधूरी सोच के लोगों ने 
अपने जैसा मानने की कीमत मांगी 
हाँ अधूरे लोगों ने पूरा मानने की कीमत 
लेकिन अधूरे लोगों की पूरी बात गलत थी 
उसके मां बाप उसे पूरा करते करते 
क़र्ज़ से खुद अधूरे हो गए थे 
हाँ क़र्ज़ के बोझ से अधूरे मां बाप
पैसे से उसकी ख़ुशी खरीदना चाहते थे 
दिखने वाले पुरे लोगों सा दर्ज़ा दिलाकर 
उसने इंकार कर दिया पूरा बनने से 
हाँ वह पैसों की वैसाखी से पूरा नहीं बनी
मुझे पता चला एक रोज़ उसी से 
उसने एक अपने जैसे अधूरे को चुना 
आज वह उसे पति कहती है गर्व से 
हाँ उसका विरोध "पूरे लोगों की भीड़" से 
शायद पैसों की वैसाखी से भी हार जाता
मगर मन का विद्रोह उसका जाग्रत 
दो अधूरों को एक पूरा कर गया 
हाँ, उसकी सोच पूरे लोगों के लिए 
चुनौती है अधूरा जीवन जीने वालों को 
लोग शरीर से विकलांग अच्छे हैं 
"कादर" सोच से विकलांगों का क्या करें 

लेखन :-  केदार नाथ "कादर" 

शुक्रवार, 17 सितम्बर 2010

बहस बराबर छिड़ती है...........

जैसे ही एक मनचले सिरफिरे ने
शांत सुन्दर कमल से सजे हुए 
तालाब में एक भाई-भरकम
पत्थर जोरों से फेंका,
एक जोरदार छपाक कि
आवाज हुई, शांति भंग हुई
कुछ क्षण के लिए, 
तालाब बापिस अपनी
धीर -गंभीर मुद्रा में 
बापिस आ गया, 
लेकिन उस शोर कि 
आवाज सुन कुछ विशेष 
तथाकथित ख्याति प्राप्त
विशेषग्ये बहा इकठ्ठे हो गए,
बहस जोरो कि छिड़ गयी
कोई पत्थर कितना बजनी था
ये पता लगाने में जुट गया
कोई पत्थर र्गिरने से हुई आवाज 
कि फ्रेकुएंसी जानने में लग गया
कोई कितना पानी उछलकर
तालाब से बाहर छिटक गया
इसकी जानकारी जुटाने में लग गया
एक साहब ने तो कमल ही कर दिया
उन्होंने तालाब कि उत्पत्ति पर ही सवाल 
खड़े कर दिए, उनके समर्थन में कई और
लोग भी उन्ही कि भाषा में बात करने लगे
बात तालाब से शुरू हुई 
और महासागर तक जा पहुची
किसी एक ने उन महासागरों कि
उत्पत्ति और सार्थकता पर गंभीर
प्रश्नचिन्ह लगा दिया, और अपने 
अपने दूषित तथ्यों से न जाने
क्या क्या कह दिया, लोगो कि
भावनाओ को आहत कर दिया,
सभी विशेषग्ये आपस में भिड़ गए
और पत्थर फेंकने वाला चुपचाप
तमाशा देखता रहा, मुस्कराता रहा
ये सब देख में सोचने लगा
कि कही भी कुछ फर्क नही हे
चाहे वो पार्लियामेंट हो
या साहित्य का दरबार
बहस बराबर छिड़ती हे
कई बार बहस मुद्दों पर होती हे
कई बार बहस के लिए मुद्दे ढूंढे जाते हैं
लेकिन इस सब से किसको क्या 
फ़ायदा होता हे ये कोई नही जनता
शायद उस मनचले-सिरफिरे को 
कुछ पता हो.........
लेखन :- अलोक खरे

वो....शिखर

जब मैंने 
पहाड़ पर चढ़ने के लिए 
सीढिया बनाना 
शुरू ही की थी 
उन्हें लगा 
मुझे 
मदद चाहिए होगी 
फिर 
वो 
मेरी जिंदगी में आयी 
कई वादों 
और 
नेक इरादे के साथ 
मगर 
उसका काम 
आसान भी था 
मुश्किल भी 
आसान यू 
के उसे नीचे ही रहना था 
ऐसी कोई 
शर्त तो नहीं थी 
मगर 
यही था 
जो उसके लिए 
सबसे आसान
और 
सहज स्वीकार्य होता 
ऐसा मान भी लिया गया 
उसे 
अपना नया काम 
बहुत भाया 
उसने 
बड़ा जी लगाया 
मैं
रोज ऊपर जाता 
नयी सीढिया
तराशता 
अपने लिए 
अपनो के लिए 
मैं 
रोज रात 
नीचे लौटता 
जब
अन्धेरा हो जाता 
सुबह तक 
सोया रहता 
जुल्फों की 
घनी छाव में 
चाँद को 
देखते हुवे 
जो 
बहुत हँसीं हुवा करता था
बेशक 
उन दिनों 
सुबह 
मेरा जी तो नहीं चाहता 
मगर 
वक़्त की धूप 
मुझे 
कोड़े मार मार कर जगाती 
भेजती 
ऊपर
जहा 
कल 
मैं अपना काम 
बाकी छोड़ आया था 

आज 
कई मंजिलो ऊपर 
रोज 
चढ़ना उतरना 
हो नहीं पाता 
थक जाता हूँ 
वो भी 
अब परेशान रहती है 
जुल्फों की छाव भी 
अब 
कम घनी हो रही है 
चाँद
मुरझाने लगा है
मेरे 
अपने 
जो 
चढ़ सकेंगे
शिखर पर 
मेरे बाद 
कही आराम से 
उसे सताने लगे है 
वो चाहती है 
मैं उसे भी 
साथ ले चलू 
गोद में उठाकर 
या 
नया शिखर रचू 
उसे साथ लेकर 
मैं 
अनिश्चय में 
कभी 
उसे 
कभी 
शिखर को देखता हूँ 
जहा
बस
कुछ सीढियों 
का फासला बाकी है 
फिर 
महसूस करता हूँ 
उसके 
और 
मेरे दरम्यान 
दुरी बढ़ती जा रही है 
शिखर
नजदीक आता जा रहा है 
वो 
दूर होती जा रही है !
                                          लेखन :- तरुण कुमार ठाकुर